Monday, May 3, 2021

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) Last Part

 
आरती के ससुराल पक्ष से भी घर आने की जिद पकड़े हुए थे। आरती को मानसिक अत्याचार किया जा रहा था। तुम अगर घर नहीं 
आये तो हम अपनी बेटी तुम से ले लेगे,
आरती अपनी बेटी से बहुत प्यार करती थी,  जफर का साथ नहीं मिलने के कारण आरती को ससुराल जाना पड़ा। क्योंकि फिर भी जान-बुझ कर अपनी पत्नी का साथ नहीं दे रहा था और दूसरी ओर से नफ़ीज़ा आरती के ससुराल वालो के कान भरे जा रही थी। आरती भी बहुत गुस्से में अपना सारा समान छोड़ कर अपनी बेटी को अपने साथ लेकर ससुराल निकल पड़ी। इधर नफ़ीज़ा अब गीता के कान भरने शुरू कर दिये पर गीता बातों को नहीं भूली थी। गीता के नफ़ीज़ा को अच्छे से सुना दिया। अब नफ़ीज़ा आरती और गीता के दिल से बिलकुल उतर गई थी। अब नफ़ीज़ा की शक्ल देखना, क्या उसके बारे में बात करना भी पसंद नहीं था। अब गीता और आरती की बातें अब पीठ पीछे होती थी। अब जफर भी गीता के सामने नफ़ीज़ा से बात नहीं करता था। वो भी ऐसे दिखाता था  अब मैं भी नफ़ीसा से बहुत नफरत करता हूँ। उसकी गन्दी हरकतों वैसे ही बढ़ती गई। इतना कुछ होने के बावजूद भी नफ़ीसा अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही थी। क्योंकि उसको दूसरों को बुरा और खुद को अच्छा बनाती थी। नफ़ीज़ा से घटिया औरत पूरी ज़िन्दगी में नहीं देखी होगी।

गीता और आरती के दिल से उसको हमेशा बददुआ ही निकलती थी। आखिरकार रब के घर में देर है अंधरे नहीं,  देर से ही सही पर पाप का घड़ा फूट ही गया। 

नफ़ीज़ा के पति हामिद खान  जफर खान को अपनी दुकान पर ले गए। हामिद खान और जफर दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे। हामिद खान का बहुत बड़ा कारोबार है उनका खुद का एक खिलौने उपहार केंद्र है। (Toys Gifts Centre).

सुबह के समय हामिद खान ने अभी अपनी दुकान खोली ही थी। जफर ने जैसे-तैसे हामिद खान से नफ़ीज़ा की आधी-अधूरी बातें शेयर कर दी। जफर ने बताया कि नफ़ीज़ा जिस लड़के से बात करती है। उसका नाम नैतिक राजपूत, डोडरा कंवर गांव का रहने वाला है। गीता जिस कंपनी में काम करती है।,उसी कंपनी में वो काम करता है। हामिद खान को ये लग रहा था उसकी पत्नी जो धोखा दे रही है और गीता नफ़ीज़ा को धोखा देने के लिए प्रेरित करती है। पर जफर ने अपने पैर पे खुद ही कुल्हड़ी मार दी। हामिद खान गुस्से में लाल- पीला हो कर घर आया और

नफ़ीज़ा को 2/3 थप्पड़ मार दिया। नफ़ीज़ा के घर पे क्लेश पड़ गया। हामिद खान अपनी पति से धोखा खाये बहुत दुखी था। नफ़ीज़ा को समझ आ गया की मेरे पति को मेरी हरकतों का पता चल चूका है उसने खुद आ कर हामिद को सब बताना शुरू किया और उसने हामिद को आश्वासन दिया की मेरा किसी दुसरे पुरुष से कोई सम्बन्ध नहीं है।

नफ़ीज़ा ने खुद को बचने के लिए एक योजना बनी और हामिद खान  खान  को डरने लगी मैंने तुम्हे छोड़ कर चली जायगी। दोनों पति पत्नी की बहुत कहासुनी हुई,फिलहाल यह साफ नहीं हो सका है। कि ज़फर सच बोल रहा है या नहीं। अब यही बात नफ़ीसा की तो बहुत चालाक औरत थी। उसने सारा इल्जाम जफर पर लगा दिया कि जफर मुझे मानसिक रूप से बहुत हिंसा करते हैं। इसके बाद ही मैंने जफर माफ किया पर अभी भी मुझे जफर बहुत तंग और मेरा मानसिक शोषण करता था।

और मैं अब भी मानसिक हिंसा से गुजर रही हूं। और हामिद मैं आपको बता देती पर मुझ आप के गुस्से से डर लगता था। मानती हूँ मुझ से ये गलती हो गई जो मैंने आप से बात छुपाई। नफ़ीज़ा ने अपने पति हामिद खान से कहा। चाहे आप मीना,टीना और शिवानी से पूछ लो। जफर उनको भी ये रात को कॉल और तंग करता है। जफर मेरे पीछे हाथ धो के पड़ा है। 

जफर के खिलाफ मानसिक यातना देने का आरोप लगाया है,लेकिन उसके मामले/आरोप को साबित करने के लिए सबूत का बोझ जफर पर था। हामिद खान  खान  ने जफर के साथ-2 गीता को भी कमरा खाली करने को बोल दिया।

गीता ने भी बोला मै कमरा क्यों खाली करू मेरी क्या गलती है?


मैं अपनी छोटी बेटी को लेकर कहा जाऊगी और एक दम कमरा खाली करने को क्यों बोल रहे हो।

गीता ने जाने से मना कर दिया मैं रूम खाली नहीं करुँगी। आपका निजी मामला है मुझे अपने निजी मामला में मुझे शामिल मत करो। नफ़ीज़ा आरती को फ़ोन करके कड़वी -2 बातें बोलती थी। अब बहुत हो गया पानी सर से ऊपर चला गया है।

नफ़ीज़ा को इस तरह बेइज्जत करने का हक़ गीता और आरती ने उसको क्या किसी को भी नहीं दिया था।

पर हकीकत बस ये थी कि नफ़ीज़ा घमण्ड ही नही बल्कि एक बिगड़ी हुई औरत थी बस गीता और आरती अपनी बेइज्जती का बदला लेने की सनक सवार थी।

उस दिन हम गलत नही थे हमे पता है पर इंसान भगवान नही हो सकता और ना ही हम इतने अच्छे हो सकते हैं कि अपने साथ किया बुरा बर्ताव भूल जायें।


नफ़ीज़ा की बाते कुछ दिन तक गीता और आरती ने बर्दाश्त कि फिर नफ़ीज़ा को चेतावनी भी दी। लेकिन उसकी वही हरकत में कोई बदलाव नहीं था।

सासु-माँ भी जब उसकी (नफ़ीज़ा) बातों में आने लगी थी तो आरती दिल बहुत दुखा था।

किसी ने ठीक ही कहा है:- ज़िंदगी जीना आसान नहीं होता, बिना संघर्ष के कोई महान नहीं होता, जब तक न पड़े हथौड़े की चोट, पत्थर भी भगवान नहीं होता।

अब गीता और आरती उस नफ़ीज़ा जैसी नहीं थी। जो उसके हजारों राज अपने मन मे दफ़न किये हुए थे।

वो दोनों भी चाहती थी तो उसके परिवार को बता सकती थी।

पर गीता और आरती में उस नफ़ीज़ा जैसा कोई फ़र्क नही रह जाता। लेकिन उस नफ़ीज़ा को सबक सिखाना भी जरूरी था क्योंकि बुरा करना, जितना बुरा है तो बुरा सहना भी बहुत बुरा है।

अच्छे के साथ अच्छा बनें बुरे के साथ बुरा नहीं,

क्योंकि हीरे को हीरे से तराशा तो जा सकता है पर कीचड़ से कीचड़ साफ़ नहीं हो सकता है।

आरती ने भी उसको धमकी दी कि अगर उसने मेरी और गीता बुराई करना बंद नहीं किया तो मैं उसके चरित्र का कच्चा-चिठ्ठा जरूर सबके सामने खोल दूंगी। क्योंकि जितना मैं जानती हूँ। उसे उसका आधा भी वो खुद के बारे में नहीं जानती होगी।  नफ़ीज़ा डर गई। आज उस बात को चार साल बीत गए लेकिन उसने गीता और आरती लिए कभी किसी से फिर कुछ नहीं कहा।

 ऐसा नहीं है। कि उसको यूं धमकी देकर आरती को अच्छा लगा पर उस वक्त आरती कुछ और सूझा नहीं।  आज तक भी नहीं समझ पाई हूँ। कि गीता और आरती सही किया या ग़लत। ग़लत नहीं लगता तो सही भी नही लगता।

गीता और आरती उसके साथ पेश तो वैसे ही आई जैसे वो गीता और आरती के साथ कर रही थी लेकिन गीता और आरती आज तक उसका बुरा नही किया। ना ही  किसी को उसके बारे मे कुछ नहीं बताया।  यकीन मानिये बुरा करना भी आसान नहीं होता।

 
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